भूतों ने बनाया या राजा ने बनवाया? मध्यप्रदेश के ककनमठ मंदिर का सच


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

रात का समय था...

चंबल अंचल की हवाएं सिहोनिया की धरती को छू रही थीं. चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था. न कोई शिल्पकार दिखाई दे रहा था, न कोई मजदूर, न पत्थर ढोने वाले बैल और न ही किसी निर्माण स्थल की हलचल. लेकिन लोककथाएं कहती हैं कि उस रात कुछ ऐसा हुआ, जिसे आज भी लोग सामान्य घटना मानने को तैयार नहीं हैं. कहा जाता है कि पूरी रात आकाश में हथौड़ों की आवाजें गूंजती रहीं.

पत्थरों के टकराने की ध्वनि सुनाई देती रही. ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों कारीगर एक साथ काम कर रहे हों. लेकिन जब सुबह हुई, तो वहां कोई कारीगर नहीं था. सामने खड़ा था एक विशाल शिव मंदिर.

एक ऐसा मंदिर, जो आज करीब एक हजार साल बाद भी लोगों को हैरान करता है. यह है मध्य प्रदेश के मोरैना जिले का रहस्यमयी .ककनमठ मंदिर. जब राजा कीर्तिराज ने भगवान शिव से मांगा था एक चमत्कार, 11वीं शताब्दी का समय था. कच्छपघात राजवंश का शासन चंबल क्षेत्र में अपनी शक्ति और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध था. राजा कीर्तिराज केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि धर्म और कला के संरक्षक भी माने जाते थे.

लोककथाओं के अनुसार राजा की इच्छा थी कि उनके राज्य में भगवान शिव का ऐसा मंदिर बने, जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियां भी आश्चर्यचकित रह जाएं. लेकिन उस समय इतने विशाल मंदिर का निर्माण आसान नहीं था. कहा जाता है कि राजा ने कई दिनों तक भगवान शिव की आराधना की. उपवास रखे, यज्ञ कराए और महादेव से प्रार्थना की कि वे स्वयं इस कार्य में सहायता करें. फिर एक रात उन्हें एक अद्भुत स्वप्न दिखाई दिया.

कथा कहती है कि सपने में भगवान शिव प्रकट हुए और बोले- मंदिर बन जाएगा, लेकिन एक शर्त है. जब तक निर्माण पूरा न हो जाए, कोई मनुष्य उसे देखेगा नहीं." राजा ने यह बात पूरे नगर में घोषित करवा दी. वह रात, जब अदृश्य कारीगरों ने शुरू किया निर्माण, लोकविश्वास के अनुसार जैसे ही रात हुई, पूरा नगर अपने घरों में बंद हो गया. फिर अचानक हवा में विचित्र ध्वनियां गूंजने लगीं. कहीं छेनी चलने की आवाज.

कहीं पत्थरों के कटने की ध्वनि. कहीं विशाल शिलाखंडों के सरकने का आभास. लेकिन कोई दिखाई नहीं देता था. लोग अपने घरों में बैठे यह सब सुनते रहे. कहा जाता है कि अदृश्य शक्तियां भगवान शिव के आदेश पर मंदिर का निर्माण कर रही थीं. एक जिज्ञासा जिसने रोक दिया देवताओं का काम लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है.

लोककथा के अनुसार उसी रात एक किशोर लड़के की जिज्ञासा उस पर भारी पड़ गई. वह यह देखने के लिए बाहर निकल आया कि आखिर मंदिर बना कौन रहा है. जैसे ही उसने निर्माण स्थल की ओर देखा, अदृश्य शक्तियों को मानव दृष्टि का आभास हो गया. और उसी क्षण सब कुछ शांत हो गया.

न हथौड़ों की आवाज.

न पत्थरों की हलचल.

न कोई निर्माण.

जब सुबह लोग बाहर निकले, तो मंदिर लगभग तैयार खड़ा था.

लेकिन पूरी तरह नहीं.

कुछ नक्काशियां अधूरी थीं.

कुछ हिस्सों में पत्थर ऐसे दिखाई देते थे मानो काम अचानक बीच में छोड़ दिया गया हो. तब से यह मान्यता प्रचलित हो गई कि .ककनमठ मंदिर इसलिए अधूरा रह गया क्योंकि किसी मनुष्य ने देवताओं के कार्य को देख लिया था. बिना चूना, बिना सीमेंट, फिर भी हजार साल से खड़ा है मंदिर, .ककनमठ मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य केवल उसकी लोककथा नहीं है. उसकी वास्तविक संरचना भी लोगों को चौंका देती है. मंदिर में विशाल पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार रखा गया है कि पहली नजर में यह समझना कठिन हो जाता है कि इन्हें जोड़े रखा कैसे गया है.

स्थानीय लोग अक्सर कहते हैं- 'पत्थर पर पत्थर रखा है, लेकिन बीच में कुछ नहीं.' यही कारण है कि सदियों से यह मंदिर रहस्य और आस्था का केंद्र बना हुआ है. हालांकि पुरातत्वविदों का मानना है कि उस काल के शिल्पकारों ने उन्नत स्थापत्य तकनीकों का उपयोग किया था, जिसके कारण यह संरचना आज भी खड़ी है.

राजा कीर्तिराज और सिहोनिया की गौरवगाथा

ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि .ककनमठ मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में कच्छपघात वंश के शासक राजा कीर्तिराज के काल में हुआ था. उस समय सिहोनिया इस क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण राजधानी थी. राजा कीर्तिराज कला, स्थापत्य और धर्म के संरक्षक माने जाते थे. उनके शासनकाल में अनेक धार्मिक संरचनाओं का निर्माण हुआ, लेकिन .ककनमठ मंदिर सबसे विशिष्ट माना जाता है. विशाल शिखर, ऊंची संरचना और अद्भुत शिल्पकला इसे मध्य भारत के महत्वपूर्ण शिव मंदिरों में शामिल करती है. गांव वालों की नजर में आज भी यह कोई साधारण मंदिर नहीं

मंदिर के आसपास रहने वाले बुजुर्ग आज भी इसे केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं मानते. उनके लिए यह भगवान शिव की कृपा का प्रमाण है. कई स्थानीय लोग मानते हैं कि यहां आज भी एक अलौकिक ऊर्जा महसूस होती है. कुछ लोग कहते हैं कि मंदिर के आसपास की शांति सामान्य नहीं लगती. कुछ इसे महादेव की उपस्थिति मानते हैं, तो कुछ इसे उस अधूरी रात की याद बताते हैं, जब देवताओं ने मंदिर बनाना शुरू किया था.

इतिहास और आस्था के बीच खड़ा एक अनसुलझा रहस्य

.ककनमठ मंदिर को इतिहास अपने तरीके से समझाता है.

पुरातत्व इसे 11वीं सदी के उत्कृष्ट शिल्पकारों की अद्भुत कृति मानता है.

लेकिन लोककथाएं एक अलग कहानी सुनाती हैं.

एक ऐसी कहानी जिसमें भगवान शिव हैं.

राजा कीर्तिराज हैं.

अदृश्य निर्माणकर्ता हैं और एक जिज्ञासु बालक है, जिसकी एक नजर ने मंदिर को हमेशा के लिए अधूरा छोड़ दिया. सच चाहे जो भी हो, लेकिन जब कोई श्रद्धालु मोरैना की उस शांत धरती पर खड़े होकर .ककनमठ मंदिर के ऊंचे शिखर को देखता है, तो उसके मन में एक सवाल जरूर उठता है- क्या यह सचमुच इंसानों ने बनाया था, या फिर उस रात यहां कुछ ऐसा हुआ था जिसे इतिहास कभी पूरी तरह समझ नहीं