आज के दौर में एक क्लिक पर कुंडली तैयार हो जाती है, लेकिन क्या कंप्यूटर से बनी कुंडली पारंपरिक ज्योतिष की जगह ले सकती है? क्या किसी ग्रह की "पावर" कम या ज्यादा होने का मतलब व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर पड़ना है? और आखिर क्यों हर साल रक्षा बंधन, जन्माष्टमी या दीपावली की तारीखों को लेकर अलग-अलग पंचांगों में विवाद देखने को मिलता है?
इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए द हिंदू टुडे लंदन ने इंडियन काउंसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंसेज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित रमेश चिंतक से विशेष बातचीत की. इस चर्चा में उन्होंने कंप्यूटर जनित कुंडली, ग्रहों की स्थिति, पंचांग सुधार, विवाह में कुंडली मिलान, नाड़ी दोष और आधुनिक ज्योतिष के बदलते स्वरूप पर विस्तार से अपनी राय रखी. उन्होंने बताया कि तकनीक सुविधाजनक जरूर है, लेकिन ज्योतिष की मूल परंपराओं और गणनाओं को समझना आज भी उतना ही जरूरी है जितना पहले था.