हनुमान जी ने क्यों छोड़ा श्रीराम का साथ? बोले- मृत्युलोक में ही रहूंगा

श्रेणी: General | लेखक : | दिनांक : 18-Feb-26 02:07:03 AM

अयोध्या शोध संस्थान के पूर्व निदेशक वाईपी सिंह कहते हैं कि एक मकान का निर्माण करने में महीनों और साल का समय आज भी लग जाता है, तो एक पूरा शहर कितने सालों में बसा होगा इसका महज अनुमान लगाया जा सकता है. डू राजस के इस लुप्त शहर में लोग बंदर की पूजा करते थे, जो निश्चित तौर पर रामायण के हनुमान ही हैं. यह अहिरावण का राज्य क्षेत्र था और वह राम व लक्ष्मण को उठाकर वहां ले गया था, जहां से हनुमान जी उन्हें वापस लाते हैं.

यही वजह है कि उस क्षेत्र के लोगों ने हनुमान जी को महाशक्तिशाली मानते हुए उनकी पूजा करनी शुरू कर दी और उन्हें अपना भगवान माना. त्रेता युग में भगवान श्री राम जब 11000 वर्ष की लीला पूर्ण करके अपने धाम वैकुंठ जाने लगे, तो हनुमान जी को भी ले जाना चाहते थे. हनुमान जी ने पूछा प्रभु, वहां वैकुंठ में आपकी कथा होती है. भगवान ने कहा, वहां कथा तो नहीं होती.

हनुमान जी ने कहा, प्रभु हमें तो आपकी कथा से बहुत प्रेम है, इसलिए मैं आपकी कथा सुनने के लिए इस मृत्युलोक में ही रहूंगा और तब तक रहूंगा जब तक एक व्यक्ति भी आपकी कथा सुनाने वाला होगा. इसलिए श्री हनुमान जी महाराज भगवान की लीला स्मरण के समय वैकुंठ नहीं गए, अयोध्या में ही रुक गए.

उन्हें जो स्थान भगवान ने दिया, वही स्थान श्री हनुमान गढ़ी है. हनुमान गढ़ी का मतलब हनुमान जी का किला है. एक प्रकार से वर्तमान में हनुमान जी महाराज ही अयोध्या के राजा हैं और उनकी दिव्य अनुभूति भक्तों को होती रहती है.

कैरेबियाई देशों त्रिनिदाद और टोबैगो, सरी नाम पेरू में भी राम और उनके रामायण के प्रमाण मिलते हैं. पेरू के लोग आज भी सूर्य की पूजा करते हैं और यहां के आदिवासी इलाकों में लोग अपने मुंह के अग्र भाग को लाल रंग से रंगना पसंद करते हैं, जो हनुमान जी से उनके संबंधों की निकटता का परिचायक है. पेरू में राजा स्वयं को सूर्यवंशी मानते हैं और कौशल्या सुत राम का वंशज कहलाना पसंद करते हैं.

माना जाता है कि सीता की खोज में सुग्रीव की सेना का एक दल समुद्र के रास्ते यहां तक पहुंचा था. यहां राम-सीतो नाम से हर साल जून में एक उत्सव भी मनाया जाता है.

कलकाता सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सर विलियम जोनस ने 1744 और 1794 में एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित अपने लेख में इसका पूरा विवरण दिया है. दक्षिण और उत्तरी अमेरिका के साथ ही मध्य अमेरिका के देशों में भी राम और रामायण के कई प्राचीन प्रमाण मौजूद हैं. मानव विज्ञानी डॉक्टर रॉबर्ट हेन गिल्डर ने कहा है कि जो लोग मानते हैं कि भारत के लोग समुद्र पार जाने में सक्षम नहीं थे, वह पूरी तरह गलत है.

हिंदू और बौद्ध संस्कृत का प्रभाव दक्षिण एशिया, विशेष तौर पर मेक्सिको में दिखाई देता है. सूरी नाम के बारे में माना जाता है कि यह श्रीराम शब्द का डच भाषा के संपर्क में आने के बाद बिगड़ा हुआ रूप है. श्रीराम शब्द ही सूरी नाम बन गया है. इस पूरे देश में रामलीला की अत्यंत समृद्ध परंपरा आज भी विद्यमान है. लोग अपने जीवन में राम शब्द का प्रयोग खुलकर करते हैं.

दक्षिण पूर्व एशिया में राम और उनकी रामायण की गहरी छाप दक्षिण पूर्व एशिया के देशों—कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, आज के म्यांमार (पहले के बर्मा), फिलिपींस, थाईलैंड, सिंगापुर और वियतनाम—में भी देखने को मिलती है.

भारत में तो राम और उनकी रामायण की महत्ता धार्मिक कारणों से भी है, लेकिन इस पूरे क्षेत्र में राम और रामायण को गौरव की प्राप्ति श्रेष्ठ मानव मूल्यों के आधार पर ही है. मतलब इस क्षेत्र में लोग हिंदू धर्म के अनुयायी नहीं हैं, उनके धर्म अन्य हैं, पूजा पद्धति अलग है, लेकिन राम और रामायण को वे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसमें मानव मूल्य की श्रेष्ठता प्राप्त होती है.

इंडोनेशिया के मुस्लिम शिक्षक ने भी कहा था कि रामायण और राम के जीवन को मानवता के लिए बहुमूल्य माना जाता है और इस आदर्श को जीवन में लागू करने का अभिलाषी है. राम का जीवन चरित्र इस पूरे क्षेत्र में विभिन्न रूपों में उपस्थित है—चित्रों से लेकर शिलालेख और राम लीलाओं में.

वी राघवन ने अपनी पुस्तक The Ramayan in Greater India और सुधा वर्मा ने आग्नेय एशिया में रामकथा में इसका विस्तार से वर्णन किया है.

लाओस, कंपू चिया और थाईलैंड के राजमहलों और बौद्ध विहारों की दीवारों पर रामायण की पूरी कहानी चित्रों के रूप में संरक्षित है. इन चित्रों में रामायण फलक क्रमवार अंकित है. थाईलैंड के राजमहल परिसर में स्थित बुद्ध भी मंदिर की दीवार पर रामायण के चित्र हैं.

इंडोनेशिया के बाली द्वीप में सीता की अग्नि परीक्षा का चित्र सर्वाधिक लोकप्रिय है. वियतनाम (जिसे प्राचीन ग्रंथों में चंपा देश कहा गया) के बोचा नामक स्थान पर लगभग 2000 साल पुराना क्षतिग्रस्त शिलालेख मिला है, जिस पर लिखा है लोकस गता गतिम.

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में भी इसी प्रकार का श्लोक मौजूद है. वियतनाम में कई शिलाखंड प्राप्त हुए हैं जिन पर भारतीय संस्कृति, विशेषकर रामायण, के कथानक अंकित हैं.

दक्षिण पूर्व एशिया के इन देशों में ऐसे शिलालेख भी मिले हैं जो राम और रामायण के क्षेत्र से निकट संबंधों की गाथा बताते हैं. जावा (आज का इंडोनेशिया), कंबोडिया के अंकोरवाट और थाईलैंड के जेतुवन विहार में ऐसे शिला क्षेत्रों की बहुतायत है.

जावा की एक नदी का नाम शरयू है, जो अयोध्या की सरियु नदी का स्मरण कराती है. इस क्षेत्र में एक शहर का नाम किस्क है, जो रामायण के किस्किंधा से निकटतम है. जावा के एक शहर का नाम सेतु विंदा है, जो रामेश्वरम का जावानी भाषा में परिवर्तित रूप है.

थाईलैंड में प्राचीन नगर द्वारावती का विवरण प्राप्त होता है, इसे द्वारिका कहा जा सकता है. थाई सम्राट रामा ति बोदी ने 1350 ईसवी में अपनी राजधानी का नाम अयोध्या रखा.

राम का जीवनचरित्र इतना मनमोहक और मानव मूल्यों से समृद्ध है कि जिस भी क्षेत्र के मनुष्यों का राम और रामायण से परिचय हुआ, वह सब राममय हो गए.