जब रातों-रात पत्थर बन गई थी पूरी बारात? आज भी दूल्हे शादी से पहले यहां टेकते हैं माथा


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

कल्पना कीजिए...घना जंगल है. चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है. रात गहरा चुकी है. मशालों की रोशनी में एक बारात अपने गांव लौट रही है. दूल्हा-दुल्हन थक चुके हैं. तभी फैसला होता है कि कुछ देर यहीं जंगल में आराम कर लिया जाए. लेकिन किसी बुजुर्ग की एक चेतावनी हवा में गूंजती है-"सुबह होने से पहले यहां से निकल जाना... वरना पूरी बारात पत्थर बन जाएगी."

कहानी यहीं से शुरू होती है. थकान इतनी थी कि किसी ने उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया. सभी गहरी नींद में सो गए. फिर सूरज निकला... और लोक मान्यता के अनुसार, पूरी बारात हमेशा के लिए पत्थर में बदल गई. यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के चंदनगांव के जंगलों में पीढ़ियों से सुनाई जाने वाली लोककथा है. आज भी यहां मौजूद एक विशाल संतुलित चट्टान को लोग 'भरत देव बाबा' के रूप में पूजते हैं.

जंगल के बीच खड़ी वह रहस्यमयी चट्टान

छिंदवाड़ा के पास चंदनगांव के जंगल में एक विशाल चट्टान दूसरी चट्टान के ऊपर बेहद असामान्य तरीके से टिकी हुई है. पहली नजर में इसे देखकर लगता है कि शायद अगली ही आंधी में यह नीचे गिर जाएगी. लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि दशकों से तेज बारिश, तूफान और मौसम की मार झेलने के बावजूद यह चट्टान अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली. यही कारण है कि यह स्थान धीरे-धीरे आस्था का बड़ा केंद्र बन गया.

भरत देव बाबा और भारतीन मां की लोककथा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, भरत देव बाबा का विवाह भारतीन मां से हुआ था. शादी के बाद जब उनकी बारात लौट रही थी, तब रास्ते में चंदनगांव के जंगल में विश्राम करने के लिए रुक गई. कहते हैं कि किसी संत या बुजुर्ग ने उन्हें आगाह किया था कि सूर्योदय से पहले इस स्थान को छोड़ देना, क्योंकि सुबह होने पर यहां रुकने वाला हर व्यक्ति पत्थर बन जाएगा. लेकिन पूरी बारात गहरी नींद में सो गई. जैसे ही सुबह हुई, दूल्हा, दुल्हन और पूरी बारात पत्थर में बदल गई. आज जिस विशाल चट्टान की पूजा की जाती है, उसे उसी घटना का प्रतीक माना जाता है.

शादी से पहले यहां क्यों आते हैं दूल्हे?

इस लोकविश्वास का असर आज भी दिखाई देता है. आसपास के गांवों के कई दूल्हे अपनी शादी से पहले सबसे पहले भरत देव बाबा के दर्शन करने पहुंचते हैं. वे चट्टान पर सिंदूर चढ़ाते हैं, जल से अभिषेक करते हैं और पूजा-अर्चना के बाद ही घोड़ी पर सवार होकर विवाह स्थल के लिए रवाना होते हैं. लोगों का मानना है कि ऐसा करने से वैवाहिक जीवन सुखी रहता है और दांपत्य संबंध मजबूत बनते हैं.

'यह चट्टान हर साल बड़ी हो रही है'

इस जगह से जुड़ा सबसे रहस्यमयी दावा इसकी बढ़ती हुई ऊंचाई को लेकर है. आमता गांव के रहने वाले 65 वर्षीय रामदयाल पाल बताते हैं कि उनका बचपन चंदनगांव में बीता है. उनके अनुसार, जब वे छोटे थे तब यह चट्टान आज की तुलना में काफी छोटी दिखाई देती थी. वर्षों बाद जब वे दोबारा यहां आए तो उन्हें लगा कि इसका आकार पहले से बड़ा हो चुका है. हालांकि इस दावे की कोई वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग इसे भरत देव बाबा का चमत्कार मानते हैं.

तूफान भी नहीं हिला सके यह विशाल पत्थर

गांव के बुजुर्ग देवेंद्र अदाक बताते हैं कि उन्होंने बचपन से इस चट्टान को इसी स्थिति में देखा है. उनका कहना है कि कई बार भीषण आंधियां और तेज बारिश आईं, लेकिन दूसरी चट्टान पर संतुलित यह विशाल पत्थर कभी नहीं गिरा. यही बात लोगों की आस्था को और मजबूत करती है.

अब बन रहा है पर्यटन और आस्था का नया केंद्र

जिस स्थान पर भरत देव बाबा विराजमान हैं, उसे पहले घने जंगल के रूप में जाना जाता था. बाद में इसे जैव विविधता क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई गई. अब यहां पर्यटन सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं. आसपास नदी किनारे नौकायन, बच्चों के लिए पार्क, पैदल पथ और अन्य सुविधाएं तैयार की जा रही हैं ताकि लोग प्रकृति के साथ इस अनोखी लोकआस्था को भी करीब से महसूस कर सकें.

सिर्फ मंदिर नहीं, लोगों की भावनाओं का केंद्र

आज भरत देव बाबा का यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं रह गया है. यहां लोग बच्चों के मुंडन संस्कार कराते हैं, परिवार के साथ पिकनिक मनाने आते हैं और नई शुरुआत से पहले आशीर्वाद लेने जरूर पहुंचते हैं. कई लोगों के लिए यह एक धार्मिक स्थल है, तो कई इसे लोक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण मानते हैं.

क्या सचमुच बढ़ रही है चट्टान?

क्या यह चट्टान वास्तव में हर साल बड़ी हो रही है? क्या पूरी बारात सच में पत्थर बन गई थी? इन सवालों का वैज्ञानिक जवाब फिलहाल उपलब्ध नहीं है. लेकिन इतना जरूर है कि छिंदवाड़ा के जंगलों में सदियों से सुनाई जा रही यह लोककथा आज भी लोगों की आस्था, संस्कृति और परंपरा का अहम हिस्सा बनी हुई है. शायद यही वजह है कि हर साल अनगिनत लोग यहां सिर्फ एक चट्टान देखने नहीं, बल्कि उस कहानी को महसूस करने आते हैं, जो पीढ़ियों से बिना किसी किताब के लोगों की यादों में जिंदा है.