इस गांव में बहनें भाइयों को नहीं बांधती राखी... खेत, पेड़ और पति को मानती हैं अपना असली रक्षक


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

रक्षाबंधन का त्योहार आते ही बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सज जाते हैं. हर घर में बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधने की तैयारी करती हैं. बचपन की यादें ताजा होती हैं, मिठाइयों की खुशबू फैलती है और भाई अपनी बहन की रक्षा का वादा करता है. यही तस्वीर पूरे भारत में लगभग हर जगह दिखाई देती है. लेकिन अगर आपसे कहा जाए कि भारत में एक ऐसा समाज भी है, जहां बहनें अपने भाइयों को राखी बांधना जरूरी नहीं मानतीं, तो शायद पहली बार में इस पर यकीन करना मुश्किल हो.

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के कुछ गोंड आदिवासी गांवों में आज भी एक ऐसी परंपरा जीवित है, जो बाकी देश से बिल्कुल अलग है. यहां की महिलाओं के लिए रक्षाबंधन का मतलब भाई की कलाई नहीं, बल्कि खेतों की लहलहाती फसलें, जंगल के विशाल पेड़ और वह प्रकृति है, जिसने हमेशा उनका साथ दिया है.

'भाई साल में एक बार आता है, लेकिन पेड़ हर दिन साथ रहते हैं'

बिछुआ विकासखंड के गुलसी गांव की रहने वाली भागीरथी उइके जब इस परंपरा के बारे में बताती हैं तो उनकी बात सीधे दिल को छू जाती है. वह कहती हैं कि, 'भाई तो साल में एक बार आता है, लेकिन खेत और पेड़ रोज हमारे साथ रहते हैं. यही हमें अनाज देते हैं, यही हमारे बच्चों का पेट भरते हैं. फिर राखी उसी को क्यों न बांधी जाए जो हर दिन हमारी रक्षा करता है? यही सोच पीढ़ियों से इस समुदाय की पहचान बनी हुई है.

यहां रक्षाबंधन खेतों में मनाया जाता है

रक्षाबंधन की सुबह जब शहरों में बहनें भाइयों के घर पहुंचती हैं, उसी समय इन गांवों की महिलाएं पूजा की थाली लेकर खेतों की ओर निकल जाती हैं. वे सबसे पहले अपनी फसलों की पूजा करती हैं. इसके बाद पीले धागे से बनी विशेष 'देव राखी' फसलों और पेड़ों पर बांधती हैं. यह केवल एक रस्म नहीं होती, बल्कि उस प्रकृति के प्रति सम्मान होता है जिसने पूरे साल उनके परिवार का पालन-पोषण किया. महुआ, चिरौंजी, हर्रा, बहेड़ा और जंगल से मिलने वाले दूसरे वन उत्पाद ही यहां के लोगों की आय का बड़ा जरिया हैं. इसलिए जंगल उनके लिए सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि जीवन देने वाला साथी है.

पति को मानती हैं जीवन का सबसे बड़ा रक्षक

गोंड समुदाय की बुजुर्ग महिलाओं का मानना है कि राखी उसी को बांधी जानी चाहिए, जो हर परिस्थिति में साथ खड़ा रहे. उनके अनुसार विवाह के बाद पति ही जीवन भर सुख-दुख में साथ निभाता है. ऐसे में वही उनका असली रक्षक है. यही वजह है कि लंबे समय तक इस समाज में भाइयों को राखी बांधने की परंपरा नहीं रही.

देव राखी की अपनी अलग पहचान

बाजार में मिलने वाली चमकदार राखियों से अलग, गोंड समुदाय की 'देव राखी' बेहद साधारण लेकिन आस्था से भरपूर होती है. पीले धागे और कपास से तैयार इस राखी की पहले पूजा की जाती है. फिर इसे भगवान, खेतों, पेड़ों और जंगलों में बांधा जाता है. यह रक्षा का प्रतीक होने के साथ-साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त करती है.

अब नई पीढ़ी बदल रही है तस्वीर

समय के साथ इस परंपरा में भी बदलाव दिखाई देने लगा है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले लगभग सभी महिलाएं भाइयों को राखी नहीं बांधती थीं. लेकिन अब नई पीढ़ी की बेटियां और बहुएं भाई के साथ रक्षाबंधन मनाने लगी हैं. इसके बावजूद खेतों और पेड़ों को देव राखी बांधने की परंपरा आज भी कायम है. यानी आधुनिकता ने रिश्तों को जोड़ा है, लेकिन प्रकृति के प्रति सम्मान आज भी वैसा ही बना हुआ है.

रिश्तों को देखने का नजरिया भी अलग

गोंड समुदाय की सामाजिक व्यवस्था भी कई मायनों में अलग है. यहां विवाह के नियम दूसरे समाजों से भिन्न रहे हैं. कई स्थानों पर कुल देवताओं की परंपरा के आधार पर रिश्ते तय किए जाते हैं. यही कारण है कि पति-पत्नी के रिश्ते को यहां विशेष महत्व दिया जाता है और पति को परिवार का सबसे बड़ा संरक्षक माना जाता है.

भारत की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक है गोंड समाज

गोंड जनजाति देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी में शामिल है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा और कई अन्य राज्यों में इनकी बड़ी संख्या निवास करती है. अकेले छिंदवाड़ा जिले में लाखों गोंड रहते हैं, जिनमें हर्रई और बिछुआ क्षेत्र इस अनोखी परंपरा के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं.

रक्षाबंधन का एक अलग संदेश

जहां दुनिया रक्षाबंधन को भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार मानती है, वहीं छिंदवाड़ा के इन गांवों में यह पर्व इंसान और प्रकृति के बीच अटूट रिश्ते की याद दिलाता है. यह परंपरा बताती है कि रक्षा केवल इंसान ही नहीं करता. कभी-कभी खेत, पेड़, जंगल और प्रकृति भी हमारी जिंदगी के सबसे बड़े रक्षक बन जाते हैं. शायद इसलिए यहां राखी सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि उस धरती को धन्यवाद कहने का तरीका है, जिसने पीढ़ियों से इन लोगों का जीवन संवार रखा है.